ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की टैरिफ धमकी से EU में हड़कंप, अमेरिका–यूरोप रिश्तों पर मंडराया संकट
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दी गई टैरिफ धमकी ने एक बार फिर अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है। यह विवाद अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे वैश्विक राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और पश्चिमी गठबंधनों की स्थिरता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यूरोपीय संघ (EU) के शीर्ष नेताओं ने इस स्थिति को “खतरनाक नीचे की ओर जाती सर्पिल” करार देते हुए चेतावनी दी है कि अगर समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो इसके दूरगामी नतीजे अटलांटिक के दोनों किनारों पर महसूस किए जाएंगे।
फरवरी से टैरिफ, जून में बढ़ेगा दबाव
मामला तब और गंभीर हो गया जब ट्रंप ने घोषणा की कि फरवरी 2026 से अमेरिका आठ यूरोपीय देशों से आने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाएगा। ट्रंप का आरोप है कि ये देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण या उसकी खरीद का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि अमेरिका को “ग्रीनलैंड की पूरी और अंतिम खरीद” की अनुमति नहीं मिली, तो 1 जून 2026 से यह टैरिफ बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा।
इस प्रस्तावित टैरिफ की जद में डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड जैसे प्रमुख यूरोपीय देश आते हैं। इन देशों के लिए यह फैसला न सिर्फ आर्थिक झटका है, बल्कि राजनीतिक दबाव की एक नई रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है।
EU की संप्रभुता और एकजुटता पर सीधी चुनौती
यूरोपीय संघ के लिए यह मामला केवल व्यापारिक नुकसान का नहीं है, बल्कि उसकी संप्रभुता और एकजुटता की सीधी परीक्षा बन गया है। इसी वजह से 18 जनवरी 2026 को EU के 27 सदस्य देशों के राजदूतों की एक आपात बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में इस बात पर चर्चा होगी कि अगर अमेरिका वाकई टैरिफ लागू करता है, तो यूरोप की सामूहिक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।
EU के भीतर यह समझ बन रही है कि कोई भी फैसला जल्दबाज़ी में नहीं लिया जाएगा। नेताओं का मानना है कि प्रतिक्रिया सोच-समझकर, रणनीतिक रूप से और सभी सदस्य देशों की सहमति से होनी चाहिए, ताकि यूरोप की एकता पर कोई आंच न आए।
EU नेताओं का कड़ा संदेश
यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग के शीर्ष नेताओं ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट संदेश दिया है कि यूरोप डरने वाला नहीं है। उनका कहना है कि यूरोपीय संघ एकजुट रहेगा, समन्वय के साथ काम करेगा और अपनी संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि EU की प्राथमिकता टकराव नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति के ज़रिये समाधान निकालना है। लेकिन अगर हालात व्यापार युद्ध की ओर बढ़ते हैं, तो यूरोप जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा।
काजा कैलास की चेतावनी
यूरोपीय संघ की शीर्ष राजनयिक काजा कैलास ने इस पूरे विवाद को व्यापक वैश्विक संदर्भ में देखा है। उनके अनुसार, टैरिफ लगाने से अमेरिका और यूरोप—दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा, महंगाई बढ़ेगी, व्यापार प्रभावित होगा और आर्थिक अस्थिरता बढ़ेगी।
कैलास ने यह भी चेताया कि ऐसे विवाद EU के “मुख्य लक्ष्य” से ध्यान भटका सकते हैं, जो फिलहाल यूक्रेन में जारी रूस की जंग को समाप्त करने और यूरोपीय क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने से जुड़ा है।
रूस और चीन को होगा फायदा?
काजा कैलास ने एक अहम और संवेदनशील मुद्दे की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि सहयोगी देशों के बीच बढ़ती दरार का सबसे ज्यादा फायदा रूस और चीन जैसे देश उठाते हैं। उनके शब्दों में, “जब हमारे बीच मतभेद होते हैं, तब हमारे विरोधी खुश होते हैं।” यह बयान इस बात को रेखांकित करता है कि अमेरिका और यूरोप के बीच यह तनाव केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।

ग्रीनलैंड क्यों है इतना अहम?
ग्रीनलैंड इस पूरे विवाद का केंद्र बिंदु बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से ग्रीनलैंड बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, खासकर सुरक्षा, सैन्य स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों के कारण। अमेरिका पहले भी ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जता चुका है, लेकिन डेनमार्क और यूरोपीय संघ ने हमेशा इस विचार को सिरे से खारिज किया है।
यूरोपीय नेताओं का कहना है कि किसी भी क्षेत्र की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को व्यापारिक दबाव या टैरिफ की धमकी के ज़रिये हल नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, अगर ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर कोई वास्तविक चिंता है, तो उसे नाटो जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बातचीत के ज़रिये सुलझाया जाना चाहिए।
ट्रंप की पुरानी रणनीति, लेकिन नया जोखिम
ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीति कोई नई बात नहीं है। अपने राजनीतिक करियर में वह कई बार टैरिफ और आर्थिक दबाव को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर चुके हैं। हालांकि इस बार मामला इसलिए ज्यादा संवेदनशील हो गया है, क्योंकि इसमें अमेरिका के पारंपरिक और करीबी सहयोगी सीधे निशाने पर हैं।
दशकों से अमेरिका और यूरोप के बीच मजबूत व्यापारिक, राजनीतिक और सैन्य संबंध रहे हैं। ऐसे में ग्रीनलैंड को लेकर टैरिफ की धमकी इन रिश्तों की मजबूती की एक बड़ी परीक्षा बन गई है।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा असर?
यूरोप में इस बात को लेकर भी चर्चा तेज है कि अगर टैरिफ लागू होते हैं, तो इसका सबसे ज्यादा असर किन क्षेत्रों पर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटोमोबाइल, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने और निवेशकों के भरोसे पर असर पड़ने की भी आशंका जताई जा रही है।
आगे क्या?
फिलहाल, सभी की निगाहें 18 जनवरी को होने वाली EU की आपात बैठक पर टिकी हैं। इसी बैठक के बाद यह साफ हो पाएगा कि यूरोपीय संघ सख्त जवाबी टैरिफ की राह अपनाएगा या फिर कूटनीति और बातचीत के ज़रिये इस संकट से निकलने की कोशिश करेगा।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड को लेकर शुरू हुआ यह टैरिफ विवाद केवल व्यापारिक मुद्दा नहीं रह गया है। यह संप्रभुता, सुरक्षा, गठबंधन और वैश्विक राजनीति से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है। अगर अमेरिका और यूरोप ने संयम और समझदारी से काम नहीं लिया, तो यह “खतरनाक नीचे की ओर जाती सर्पिल” वास्तव में दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों को भारी नुकसान पहुँचा सकती है।
